भारतेंदु युग: हिंदी साहित्य में पुनर्जागरण (Renaissance) की शुरुआत
हिंदी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल की शुरुआत एक ऐसे दौर से होती है जो परिवर्तन, जागरण और नवीन चेतना का प्रतीक बनता है। इस दौर को भारतेन्दु युग के नाम से जाना जाता है, जो न केवल हिंदी साहित्य का प्रथम आधुनिक चरण है बल्कि हिंदी में पुनर्जागरण या नवजागरण की आधारशिला भी माना जाता है। यह युग लगभग 1857 से 1900 ईस्वी तक फैला हुआ है, हालांकि कुछ विद्वान इसे 1868 से आरंभ मानते हैं जब भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की पत्रिका 'कविवचन सुधा' का प्रकाशन हुआ। इस काल का नामकरण स्वयं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाम पर हुआ, जिन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह कहा जाता है। वे उस संक्रमण काल के प्रतिनिधि रचनाकार थे जब हिंदी साहित्य रीतिकाल की दरबारी श्रृंगारिकता और अलंकरण प्रधानता से निकलकर जनजीवन, राष्ट्रीयता और सामाजिक सुधार की ओर मुड़ रहा था।
भारतेन्दु युग की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश शासन की कठोरता, 1857 की क्रांति का प्रभाव, बंगाल नवजागरण की लहर और भारतीय समाज में बढ़ती जागरूकता प्रमुख थी। उस समय हिंदी भाषा और साहित्य परंपरागत ब्रजभाषा के बोलबाले में था, जबकि गद्य खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप ले रहा था। फारसी और उर्दू का प्रभाव राजकाज में था, अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा था। ऐसे में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का आविर्भाव हिंदी के लिए वरदान सिद्ध हुआ। उन्होंने साहित्य को जीवन से जोड़ा और इसे जनता की आवाज बनाया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ठीक ही कहा कि भारतेन्दु ने साहित्य और जीवन के बीच बढ़ते विच्छेद को दूर किया तथा नए विषयों की ओर साहित्य को प्रवृत्त किया। यह युग इसलिए पुनर्जागरण का प्रतीक बना क्योंकि इसमें प्राचीन भारतीय गौरव का पुनरुत्थान हुआ, साथ ही पाश्चात्य प्रभाव से नवीन विचारों का समावेश भी। डॉ. नगेन्द्र जैसे विद्वानों ने इसे स्पष्ट रूप से पुनर्जागरण काल की संज्ञा दी है।इस युग की सबसे बड़ी विशेषता राष्ट्रीय चेतना का उदय थी। भारतेन्दु और उनके मंडल के रचनाकारों ने देश की गरीबी, पराधीनता, अंग्रेजी शोषण और सामाजिक कुरीतियों पर कलम चलाई। साहित्य अब केवल मनोरंजन या श्रृंगार का माध्यम नहीं रहा, बल्कि वह समाज सुधार और राष्ट्रप्रेम का हथियार बना। विधवा विवाह का समर्थन, बाल विवाह का विरोध, छुआछूत की निंदा, स्वदेशी का प्रचार और गोहत्या निषेध जैसे मुद्दे साहित्य में प्रमुखता से उभरे।भारतेन्दु की प्रसिद्ध पंक्तियाँ "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल" हिंदी भाषा के प्रचार और उसके माध्यम से राष्ट्रीय उन्नति की भावना को व्यक्त करती हैं। उनके नाटकों जैसे 'भारत दुर्दशा' और 'अंधेर नगरी' में व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों और शासकीय अन्याय का चित्रण इतना जीवंत है कि वह पुनर्जागरण की क्रांतिकारी भावना को प्रतिबिंबित करता है।गद्य साहित्य का विकास इस युग की महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। खड़ी बोली गद्य को परिष्कृत रूप देने का श्रेय भारतेन्दु को जाता है। उन्होंने राजा शिवप्रसाद और राजा लक्ष्मण सिंह की विरोधी शैलियों में समन्वय कर मध्यम मार्ग अपनाया, जिससे हिंदी गद्य सरल, सुबोध और जनसुलभ बना। निबंध, नाटक, उपन्यास, कहानी और पत्रकारिता जैसी विधाओं का सूत्रपात इसी काल में हुआ। 'कविवचन सुधा', 'हरिश्चन्द्र मैगजीन' और 'बाला बोधिनी' जैसी पत्रिकाओं ने हिंदी के प्रचार में अभूतपूर्व योगदान दिया। ये पत्रिकाएँ केवल साहित्यिक नहीं थीं, बल्कि सामाजिक जागरण की वाहक भी बनीं। नाटक विधा में भारतेन्दु ने मौलिक और अनूदित रचनाएँ दीं, जिससे हिंदी रंगमंच की नींव पड़ी। उपन्यास और कहानी के प्रारंभिक रूप भी इसी दौर में दिखाई देते हैं।काव्य की दृष्टि से यह युग संक्रमण काल था। ब्रजभाषा अभी भी प्रमुख थी, परंतु खड़ी बोली का प्रयोग बढ़ रहा था। काव्य में श्रृंगार और भक्ति के साथ राष्ट्रीयता, प्रकृति चित्रण और सामाजिक चेतना का मिश्रण हुआ।
भारतेन्दु मंडल के अन्य रचनाकार जैसे बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी और अम्बिकादत्त व्यास ने इस धारा को समृद्ध किया। काव्य अब दरबारी नहीं, जनोन्मुखी हो रहा था। परंपरा और आधुनिकता का संगम इस युग की अनोखी विशेषता थी। प्राचीन संस्कृति के प्रति गौरव तो था, परंतु कुरीतियों की आलोचना भी बेबाक थी।भारतेन्दु युग हिंदी साहित्य में पुनर्जागरण की शुरुआत इसलिए था क्योंकि इसने साहित्य को संकीर्ण घेरे से निकालकर व्यापक जनमानस से जोड़ा। यह युग केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय नवोत्थान का भी था। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जैसे युगपुरुष ने अल्प आयु में ही इतना व्यापक कार्य किया कि हिंदी साहित्य को आधुनिक आधार मिला। उनके बाद द्विवेदी युग और छायावाद जैसे चरण आए, परंतु पुनर्जागरण की प्रथम किरण भारतेन्दु युग से ही उदित हुई। यह युग हिंदी साहित्य को नई दिशा, नई ऊर्जा और नई पहचान देने वाला सिद्ध हुआ, जो आज भी प्रेरणा का स्रोत है।
