टूटी सड़कें और गांव का अधूरा विकास
भारत में ग्रामीण विकास की चर्चा जब भी होती है, तो सड़कों का मुद्दा सबसे अहम रूप में सामने आता है। यह केवल एक रास्ता का विषय नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों की नीव होती है। पिछली कुछ दहाइयों में देश के गांवों में सड़कों का जाल बिछा है। उन्नत तकनीक से तैयार ये सड़क विकास की कहानी सुनाते हैं। लेकिन इसके बावजूद बिहार जैसे राज्य के कई गांव आज भी पक्की और सुरक्षित सड़क सुविधा से वंचित हैं, और जहां सड़कें बनी भी हैं, वहां उनकी हालत इतनी खराब है कि वे लोगों के लिए सुविधा से ज्यादा परेशानी का कारण बन चुकी है।
राज्य के मुजफ्फरपुर जिले के कई गांवों की स्थिति इसका स्पष्ट उदाहरण है। यहां कुछ गांवों में दशकों पहले बनी सड़कों की आज तक मरम्मत नहीं हुई है। समय के साथ ये सड़कें पूरी तरह जर्जर हो चुकी हैं। कहीं बड़े-बड़े गड्ढे हैं, तो कहीं सड़क का नामोनिशान ही मिट गया है। बरसात के मौसम में स्थिति और भी भयावह हो जाती है। सड़कें कीचड़ और पानी से भर जाती हैं, जिससे यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कहां सड़क है और कहां गड्ढा? ऐसे में इस रास्ते से गुजरना किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसा होता है। कई बार बाइक या साइकिल सवार गिरकर घायल हो जाते हैं, और बच्चों के लिए स्कूल जाना किसी जोखिम भरे सफर से कम नहीं होता।
ग्रामीण इलाकों में सड़क की खराब स्थिति का सबसे ज्यादा असर महिलाओं और लड़कियों के जीवन पर पड़ता है। जब सड़कें टूटी-फूटी होती हैं या बिल्कुल नहीं होतीं, तो लड़कियों के लिए स्कूल जाना मुश्किल हो जाता है। कई बार परिवार सुरक्षा और सुविधा की कमी के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर कर देते हैं। सोचिए, एक लड़की को रोजाना 3-4 किलोमीटर की दूरी तय करनी हो, रास्ता कच्चा हो, बीच में पानी भरा हो और कोई सुरक्षित साधन न हो तो उसके लिए शिक्षा पाना कितना कठिन हो जाता है? यही कारण है कि कई ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की स्कूल उपस्थिति कम हो जाती है।
स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच भी सड़क की स्थिति पर निर्भर करती है। मुजफ्फरपुर के ही एक गांव में, बारिश के दिनों में एंबुलेंस तक नहीं पहुंच पाती क्योंकि सड़क पूरी तरह जलमग्न हो जाती है। ऐसे में गर्भवती महिलाओं या गंभीर रूप से बीमार लोगों को खाट या ठेले पर लादकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है। कई बार इस देरी की वजह से जान तक चली जाती है। यह स्थिति केवल एक गांव की नहीं, बल्कि बिहार के कई हिस्सों की हकीकत है।
इन समस्याओं को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2000 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरुआत की थी। इसका मुख्य उद्देश्य उन गांवों को हर मौसम में सड़क से जोड़ना था, जहां पहले कोई संपर्क नहीं था। इस योजना के तहत देशभर में अब तक लगभग 7.8 लाख किलोमीटर से अधिक ग्रामीण सड़कों का निर्माण किया जा चुका है, और लगभग 95 प्रतिशत पात्र बस्तियों को सड़क से जोड़ा गया है। बिहार में भी इस योजना के तहत लगभग 60,000 किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का निर्माण हुआ है और हजारों गांवों को मुख्य सड़कों से जोड़ा गया है।
हालांकि, जमीनी सच्चाई यह भी है कि केवल सड़क बना देना ही पर्याप्त नहीं है। कई जगहों पर सड़क बनने के बाद उसका रखरखाव नहीं किया जाता, जिससे कुछ ही वर्षों में वह खराब हो जाती है। मुजफ्फरपुर के कई गांवों में सड़क तो बनी, लेकिन उसकी मरम्मत के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं रही। परिणामस्वरूप, आज वे सड़कें उपयोग के लायक नहीं बची हैं। बजट के स्तर पर देखें तो वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार ने ग्रामीण सड़कों के लिए लगभग 19,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।
पीएमजीएसवाई-III के तहत अब तक 1.02 लाख किलोमीटर से अधिक सड़कें और 1,734 पुल पूरे किए जा चुके हैं। वहीं बिहार सरकार ने 2026-27 के बजट में ग्रामीण और सामान्य सड़क व पुलों के निर्माण (पूंजीगत परिव्यय) के लिए कुल ₹5,034 करोड़ आवंटित किए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना और सिंगल-लेन सड़कों को डबल-लेन में बदलना है। इस सराहनीय प्रयासों के बावजूद, कई बार बजट का सही उपयोग नहीं हो पाता या कार्यों में पारदर्शिता की कमी रह जाती है, जिससे योजनाओं का पूरा लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पाता है।
इस स्थिति को सुधारने के लिए जरूरी है कि सड़क निर्माण के साथ-साथ उसकी नियमित देखभाल और गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान दिया जाए। जिन गांवों में अभी तक सड़क नहीं पहुंची है, वहां प्राथमिकता के आधार पर काम होना चाहिए। साथ ही, स्थानीय पंचायतों और ग्रामीण समुदाय को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वे सड़कों की निगरानी कर सकें और समय पर मरम्मत की मांग उठा सकें। वास्तव में, अगर गांवों में मजबूत और सुरक्षित सड़कें होंगी, तो इसका सीधा असर लड़कियों की शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा और पूरे गांव के विकास पर पड़ेगा, क्योंकि सड़कें केवल रास्ते नहीं होतीं, वे अवसरों के द्वार खोलती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि सरकार, समाज और स्थानीय प्रशासन मिलकर यह सुनिश्चित करें कि कोई भी गांव विकास की इस बुनियादी जरूरत से वंचित न रह जाए।(यह लेखिका की निजी राय है)
- नेहा कुमारी
मुजफ्फरपुर, बिहार
