धननेता बनाम जननेता
कई सालों से जनता के बीच रहकर सेवा करने वाले जननेता जब चलते हैं तो भीड़ का सैलाब ही सैलाब।बच्चों, बुढ़ों, जवानों की कतार खड़ी हो जाती है। बेचारे दिन को दिन न समझा, रात को रात नही। जनसेवा करके जन नेता बना।
किसी के घर सब्जी न होती, बेचारा लेकर दौड़ा आता। किसी की बेटी की शादी में जी-जान से लगकर मदद करता। राजन की पत्नी को खून की कमी थी। खून उतार कर दे दिया नहीं तो राजन के बच्चे अनाथ हो जाते। एकदम मिलनसार व्यक्तित्व।
ऐसा जननेता एक दिन में लाखों भीड़ बिना एक पाई खर्च किये खड़ा कर देता था। जमीन से जुड़ा नेता। अन्याय के खिलाफ भिड़ जाता था। एक पैसा कभी किसी का खाया नही। ऐसा होता है जननेता।
धननेता से क्या लेना-देना? कोई दूखी है या रो रहा है या भूख की तपिश में दो दिन से खाना नहीं खाया। धन नेता तो बिसलरी वाटर हर घूंट में लेता है। उसे क्या पता कुएं के पानी का स्वाद कैसा था। होटलों में खाने वाला क्या जाने चूल्हे की रोटी सरसों का साग।
जो किसी का आंसू नहीं पोंछा। वह किसी के लिए एक अश्रु क्यों बहायेगा। धननेता तो धन से वोट को बटोरने की ताकत रखता है। आम जनता को खरीदने का रौब होता है। उस आम जनता को शराब की बोतलों से अपनी जयकारा करा सकता है।
आखिर जननेता की तरफ अपार भीड़ से महसूस हुआ जननेता का पड़ला भारी है। बिक चुका था पूरा बूथ। हर वोट पर लग गयी गड्डियों की धमक। जननेताा अपने पक्ष से जाते वोट को करवट लेते देखकर हैरान रह गये। सारी वोट
धननेता के चरणों में समर्पित हो गयी। कई वर्षों की मेहनत से बनाई गयी दीवार ढह गयी।
- जयचन्द प्रजापति 'जय'
प्रयागराज
