वैश्विक गांव Global Village में हमारी सांस्कृतिक पहचान

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वैश्विक गांव Global Village में हमारी सांस्कृतिक पहचान


वैश्विक गांव की अवधारणा मार्शल मैक्लुहान ने सबसे पहले प्रस्तुत की थी, जब उन्होंने कहा था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और संचार के माध्यम से पूरी दुनिया एक छोटे से गांव की तरह सिकुड़ जाती है। आज डिजिटल युग में यह विचार और भी साकार हो चुका है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, स्मार्टफोन, वीडियो कॉल और वैश्विक प्लेटफॉर्म ने भौगोलिक दूरी को लगभग समाप्त कर दिया है। कोई भी व्यक्ति किसी भी कोने से दुनिया भर के लोगों से तुरंत जुड़ सकता है, उनकी भाषा सुन सकता है, उनकी संस्कृति देख सकता है और उनके विचारों से प्रभावित हो सकता है। लेकिन इसी वैश्विक गांव में हमारी अपनी सांस्कृतिक पहचान का क्या स्थान रह जाता है? क्या हम अपनी जड़ों को मजबूती से थाम पाते हैं या धीरे-धीरे एक समरूप, वैश्विक संस्कृति में विलीन हो जाते हैं?

वैश्विक गांव Global Village में हमारी सांस्कृतिक पहचान
भारतीय सांस्कृतिक पहचान हजारों वर्ष पुरानी है। यह विविधता में एकता का अनुपम उदाहरण है। अलग-अलग भाषाएं, परंपराएं, त्योहार, भोजन, वेशभूषा, संगीत और जीवन-दर्शन एक साथ फलते-फूलते हैं। वैश्विक गांव ने इस पहचान को दोनों तरह से प्रभावित किया है। एक ओर तो यह हमें अपनी संस्कृति को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का अभूतपूर्व अवसर देता है। योग अब पूरी दुनिया में व्यायाम का एक प्रमुख रूप बन चुका है। दीवाली, होली और नवरात्रि जैसे त्योहार अब अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया तक में बड़े उत्साह से मनाए जाते हैं। भारतीय व्यंजन, बॉलीवुड फिल्में, क्लासिकल संगीत और नृत्य वैश्विक मंच पर अपनी जगह बना रहे हैं। प्रधानमंत्री के मन की बात जैसे कार्यक्रमों में भी बार-बार इस बात पर जोर दिया जाता है कि भारतीय संस्कृति अब वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान बना रही है। लोग विदेशों में भारतीय परिधान पहनकर, भारतीय संगीत सुनकर और भारतीय मूल्यों को अपनाकर अपनी जड़ों से जुड़े रहने की कोशिश करते हैं।लेकिन वैश्विक गांव की दूसरी ओर भी एक चुनौती है। निरंतर बहने वाली वैश्विक संस्कृति, खासकर पश्चिमी प्रभाव, युवा पीढ़ी को अपनी परंपराओं से दूर कर रही है। अंग्रेजी का प्रभुत्व, फास्ट फूड की लोकप्रियता, पश्चिमी फैशन, हॉलीवुड फिल्मों का प्रभाव और सोशल मीडिया पर दिखने वाली एक समान जीवनशैली ने कई युवाओं में यह भावना पैदा कर दी है कि अपनी संस्कृति पुरानी और पिछड़ी हुई है।

गांवों से शहरों और फिर विदेशों की ओर पलायन करने वाली पीढ़ियां अक्सर अपनी भाषा, रीति-रिवाज और मूल्यों को भूलने लगती हैं। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग घट रहा है, जबकि अंग्रेजी वैश्विक संचार की भाषा बन गई है। कई परिवारों में बच्चे अपनी मातृभाषा कम बोलते हैं और अंग्रेजी या मिश्रित भाषा में बात करते हैं। त्योहार भी अब व्यावसायिक और दिखावटी हो रहे हैं, जहां भावनात्मक गहराई कम और बाहरी चमक ज्यादा दिखती है।फिर भी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत उसकी लचीलापन और समावेशी स्वभाव में है। यह संस्कृति सदियों से बाहर से आने वाले प्रभावों को ग्रहण करती आई है और उन्हें अपने अंदर समाहित कर अपनी समृद्धि बढ़ाती रही है। वैश्विक गांव में भी यही हो रहा है। हम पश्चिमी तकनीक और जीवनशैली को अपनाते हैं, लेकिन साथ ही योग, आयुर्वेद, ध्यान और भारतीय दर्शन को भी दुनिया को सौंपते हैं। वैश्विक मंच पर भारतीयता अब एक ब्रांड बन रही है। लोग भारतीय संस्कृति को न केवल देखते हैं, बल्कि अपनाते भी हैं। यह एक तरह से सांस्कृतिक आदान-प्रदान है, जहां हम हार नहीं रहे, बल्कि अपनी पहचान को और मजबूत कर रहे हैं।सच्चाई यह है कि वैश्विक गांव हमें मजबूर नहीं करता कि हम अपनी सांस्कृतिक पहचान छोड़ दें। यह हमें विकल्प देता है। जो लोग अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहते हैं, वे अधिक मजबूती से जुड़ सकते हैं।

सोशल मीडिया पर भारतीय संस्कृति से जुड़े पेज, चैनल और समुदाय बढ़ रहे हैं। युवा पीढ़ी अब अपनी परंपराओं को नए रूप में पेश कर रही है—चाहे वह फ्यूजन म्यूजिक हो, कंटेम्पररी डांस हो या डिजिटल माध्यम से त्योहार मनाना हो। सरकार और समाज भी प्रयास कर रहे हैं कि गांवों की सांस्कृतिक विरासत को डिजिटल रूप में संरक्षित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों को भूलें नहीं।अंततः वैश्विक गांव में हमारी सांस्कृतिक पहचान न तो पूरी तरह खतरे में है और न ही पूरी तरह सुरक्षित। यह एक निरंतर यात्रा है, जहां हमें सतर्क रहते हुए अपनी विरासत को संजोना है और साथ ही वैश्विक बदलावों को अपनाते हुए उसे जीवंत रखना है। यदि हम अपनी विविधता, सहिष्णुता, आध्यात्मिकता और मानवीय मूल्यों को मजबूती से थामे रहें, तो वैश्विक गांव में भारतीय सांस्कृतिक पहचान न केवल बचेगी, बल्कि चमकेगी और दुनिया को नई दिशा भी देगी। क्योंकि सच्ची संस्कृति वही है जो बदलते समय के साथ विकसित होती है, लेकिन अपनी आत्मा को कभी नहीं खोती।

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